छत्तीसगढ़
हाईकोर्ट ने दहेज प्रताड़ना मामले में सास-ससुर की सात साल सजा रद्द की, दोनों बरी
Shantanu Roy
10 Sept 2025 11:38 PM IST

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छग
Bilaspur. बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने दहेज प्रताड़ना और दहेज हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए सास-ससुर की सात साल की सजा को रद्द कर दिया है। जस्टिस रजनी दुबे की सिंगल बेंच ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में असफल रहा। मामला जांजगीर-चांपा जिले के जैजैपुर थाना क्षेत्र के ग्राम धीवरा का है। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि अनुजराम और उनकी पत्नी इंदिराबाई ने अपनी बहू चैनकुमारी को दहेज और गहनों के लिए प्रताड़ित किया। चैनकुमारी की शादी 2006 में पवन कश्यप से हुई थी। आरोप था कि शादी के एक साल के भीतर, 29 जून 2007 को उसने केरोसिन डालकर आत्मदाह कर लिया।
ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 2008 में सास-ससुर को आईपीसी की धारा 498ए/34 में तीन साल और 304बी/34 में सात साल की सजा सुनाई थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने अपील में पाया कि मृतका के पिता, मां और भाई ने आरोपों से इंकार किया। उन्होंने अदालत में कहा कि ससुराल पक्ष ने कभी दहेज की मांग नहीं की। इसके अलावा, गहनों की मांग खुद मृतका ने अपनी मर्जी से की थी। हाईकोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि एफआईआर घटना के ढाई महीने बाद दर्ज की गई थी और इस बीच कोई स्वतंत्र गवाह भी नहीं मिला। इस स्थिति में दहेज प्रताड़ना और हत्या के आरोप प्रमाणित नहीं हो सके।
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि मृतका की मृत्यु विवाह के एक साल के भीतर हुई जरूर थी, लेकिन मृत्यु से ठीक पहले प्रताड़ना या दहेज मांग के पुख्ता सबूत नहीं मिले। सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला देते हुए जस्टिस रजनी दुबे ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को निरस्त कर दोनों आरोपियों को बरी कर दिया। साथ ही, हाईकोर्ट ने कहा कि चूंकि आरोपी पहले से जमानत पर हैं, इसलिए उन्हें 25 हजार रुपए के निजी मुचलके और एक जमानतदार प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।
इस निर्णय ने यह स्पष्ट किया कि दहेज प्रताड़ना और हत्या के मामलों में आरोप सिद्ध करने के लिए पर्याप्त प्रमाण और स्वतंत्र गवाहों का होना अत्यंत आवश्यक है। हाईकोर्ट ने इस मामले में साबित नहीं होने वाले आरोपों के आधार पर सख्त सजा को खारिज कर न्यायिक मानदंडों का पालन किया। स्थानीय समाज में इस फैसले को लेकर मिश्रित प्रतिक्रिया देखने को मिली। कुछ लोग इसे न्याय का पालन मान रहे हैं, जबकि अन्य यह सोचते हैं कि ऐसे मामलों में पीड़ित पक्ष की सुरक्षा और न्याय सुनिश्चित करने के लिए अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए। हाईकोर्ट के इस फैसले ने दहेज प्रताड़ना और हत्या के मामलों में साक्ष्य के महत्व को पुनः रेखांकित किया है। न्यायिक प्रक्रियाओं में साक्ष्य और गवाहों की भूमिका को स्पष्ट रूप से सामने लाते हुए यह निर्णय भविष्य के मामलों के लिए दिशा-निर्देश का काम करेगा।
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